बेहतर जीवन – अच्छे दिन

रबी की फसल कट चुकी थी, गांव में किसानो को अब इतना काम नहीं था।  मौसम भी धीरे धीरे गर्म हो रहा था , इधर धर्मवीर भी अपनी खेती की फसल सम्भाल चुका था।  अब उसका समय अपने बैलों की देख भाल करने में गुजर रहा था, तो दूसरी ओर उसका मन अपने धीरे धीरे आ रहे बुढ़ापे को सोच सोच अधीर हुए जा रहा था।  धर्मवीर का एक बेटा भी था परन्तु उसने खेती न करके शहर में अच्छा जीवन जीने के लिए अपनी धर्मपत्नी के कहने पर गांव कब का छोड़ दिया था। अब रामपाल कभी कभी  गर्मियों की छुट्टियों में कभी कभी गांव आ जाया करता था। रामपाल से तो अब धर्मवीर को इतना लगाव न था पर अपने तीन पोते पोतियों संग धर्मवीर पूरे दिन खेलता व शाम को गांव के तालाब, मंदिर चौपाल व अन्य जगह घूमने ले जाता। धर्मवीर की पत्नी अब इस दुनिया में नहीं थी, उसका सहारा सिर्फ एक बैल और 5  बीघा जमीन ही थी।  धर्मवीर पूरे साल तो खेती में लगा रहता पर खाली समय का खालीपन उसे बड़ा खलता था।  बैसाख और ज्येष्ठ की गर्मी में तो वैसे भी जमीन बहुत तपती है, खेती का समय एक महीने बाद जब आषाढ़ बरसता है तभी शुरू होता है।

बच्चों के आ जाने से धर्मवीर बहुत खुश था, जीवन के अंतिम पड़ाव में कुछ क्षण के लिए ही सही उसे उसके पोते पोती जो ख़ुशी देते, शायद उसी खजाने को वो सारे साल इस्तेमाल कर प्रसन्न रहने का  प्रयत्न करता ।

कहते हैं मनुष्य बड़ा स्वार्थी होता है रामपाल का स्वार्थ तो 5 बीघा जमीन है, वो ये सोच हर साल गांव आता है। आज रामपाल को आये तीन दिन हुए है , सुबह का समय है बच्चे दादा जी के साथ जंगल व खेतों की ओर गए है।  इधर रामपाल व उसकी धर्मपत्नी आपस में बात कर रहे है।

रामपाल कहता है।

“सुनहरी पिता जी के मरते ही इस जमीन को बेच दूंगा और शहर में बड़ा घर बना लूंगा।”

“लेकिन आप ऐसा किस लिए सोचते हो हमारा फ़र्ज़ हैं बाबू जी की सेवा करना मैंने तो कई बार उनसे शहर चलने को भी कहा है, परन्तु वो कहते हैं यहाँ बहुत सी यादें है, खुलापन है, शुद्ध हवा है।  वो तो ये भी कहते है की” “मैं वहाँ तुम पर बोझ बन जाऊँगा ।  शहर में रहना बड़ा महँगा हैं । यहाँ तो रूखी सूखी खा के समय निकल ही जाता हैं” । सुनेहरी रामपाल की बात काटते हुए बोली ,”आप जानते है अगर बच्चों की अच्छी पढ़ाई और बेहतर जीवन की तलाश में आप गांव छोड़ने की ज़िद्द न करते, तो इस समय जब बाबू जी को  सबसे ज्याद हमारी ज़रूरत हैं ,मैं उनकी सेवा कर रही होती। मुझे तो इन गर्मी की छुट्टियों में भी बाबू जी को गर्म गर्म भोजन कराने में बडे आनंद की  अनुभूति होती है। वो जब खा रहे होते हैं तो कभी कभी खाते खाते ही भावुक हो जाते है, उनकी नम आँखे वो सब कुछ कह देती हैं, जो शायद आप न सुन पाए हो।”

रामपाल में स्वार्थ के भाव थे उसे सुनेहरी के बोल सुन अपनी सोच पर कुछ पछतावा हुआ, पर वो कुछ बोला नहीं और मन ही मन हर्षित हुआ की मेरी पत्नी की भावना कितनी अच्छी हैं।  ये पिता जी की समस्याओं के विषय में सोच रही है और मैं जमीन का मालिक बनने की सोच रहा हूँ। उसे क्षण भर के लिए आत्मग्लानि होती है।  वो सुनेहरी से फिर पूँछता है, “तो तुम्ही बताओ हम क्या करें ?  कोई ऐसा उपाय सोचो की बाबू जी की सेवा भी हो जाये और हमारे बेहतर जीवन के सपने को भी हम पूरा कर लें। ”

सुनहरी ने झट से पूँछ लिया, ” आपको क्यों लगता है की बेहतर जीवन सिर्फ शहर में ही जी सकते हैं बल्कि गांव में नहीं ?

“मैं समझता हूँ शहर में सुविधाएँ अधिक हैं, वहां अमीर बनने के रास्ते हैं, वहां अच्छी शिक्षा भी मिलती है।” रामपाल ने जवाब दिया।

सुनहरी ने फिर पूछा तो हम अमीर क्यों नहीं बने? हम आज भी एक झुग्गी में रहते हैं, सेठ आपको समय पर तनख्वा भी नहीं देता बच्चे भी सरकारी स्कूल में ही पढ़ रहें हैं।  आप बारह बारह घंटे मजदूरी करके घर लौटते हो आपको पता ही नहीं होता कि मैं आपके जीवन को चलाने में कितना संघर्ष करती हूँ , लाइन में लग कर पानी भरना, बच्चों को तैयार करना, दूसरों के घरों में सफाई करना क्या इसे बेहतर जिंदगी कहतें हैं ?” कहते कहते सुनहरी की आँखे भर आई।

सुनहरी फिर रोते हुए बोली “आप इतने पढ़े लिखे भी नहीं हो कि मज़दूरी के अलावा आपको शहर में कोई और काम मिल जाये , जिसमे ज़्यादा पैसे मिलें।  यहाँ बाबू जी के साथ आपने बड़ी मेहनत से घर बनाया था यहां अपनी चाट है, मेरी अपनी रसोई है दो कमरे है इतना बड़ा आँगन है।  बच्चे आँगन में खेलते है हमेशा आँखों के सामने रहते है बाबूजी भी उनका बड़ा ध्यान रखते हैं।  गांव  में स्कूल भी है अच्छी पढ़ाई होती है।  आपके पास तो ज़मीन भी है आपको शहर जाकर मज़दूरी करने की क्या ज़रूरत हैं ?  मेरी मानो तो हम यहीं रुक जाएँ, बाबू जी के बुढापे का सहारा बने। खुला आसमान कोई प्रदूषण नहीं देखो कितनी सुंदर भोर है गांव की। रोज चिड़ियों की चहचाहट सुनना, आँगन में मोर का नाचना, गइया का वो प्यार से हाथ चाटना।  दस वर्ष मैं आपका कहना मान कर शहर में बेहतर जीवन ढूंढती रही, अंदर अंदर खुद से द्वंद्व करती रही और हर पल ये सोचती रही क्या इसे बेहतर जीवन कहते हैं ?”

सुनहरी आज अपने मन को हल्का कर  लेना चाहती थी शायद दस साल तक चुपचाप अपने पति  के निर्णयों पर चलने वाली सुनहरी आज अपने जीवन के सारे दर्द को कह देना चाहती थी।

उसने फिर रामपाल से कहा  “देखो स्त्री को जीवन में सब कुछ सहन करना पड़ता है।  माँ के मरने से पहले ही हम शहर चले गए थे, शहर ले जाने का निर्णय आपका था पर मेरी सासु माँ ने इसका दोषी मुझे ही माना कि बहु ने बेटे को छीन लिया हमारे बुढ़ापे की लाठी को शहर ले गई, जबकि ये निर्णय आपका था।  आज भी गांव की औरत सासु माँ के असमय  निधन का जिम्मेवार मुझे ही मानती है, वो कुँए पर कई बार इस बात का तना भी मार देती हैं।   मैं इस अपमान को भी सहन करती आई हूँ। मैं ही क्यों सारे त्याग करूँ , क्यों आपके कल आने वाले बेहतर जीवन के लिए में आज के बेहतर जीवन का त्याग करूं।  दस साल मैंने आपको  दिए मगर हालत धोबी के कुत्ते से भी बदतर हो गई ।  15 साल पहले आपने बाबू जी के साथ ये घर बनाया था मगर तब से आज तक हम सिर्फ जीने का संघर्ष कर  रहे हैं. आपके बहतर जीवन की तलाश ने मेरी सास को छीन लिया बाबू जी को देखो बिना किसी सेवा के भूखे प्यासे रहते है।  पूरी ज़मीन पर खेती भी नहीं कर पाते।  कल जब मैं कुँए पर गई तो कमला ने बताया कि अब तो उनसे रोटी भी नहीं बनती कई बार उसने पिता जी को रोटी खिलाई है।  पिता जी की धंसी हुई आँखों को देखना , लगता हैं वो दस साल में बीस वर्ष जी लिए हों, लेकिन उन्हें अभी भी कोई शिकायत नहीं कल को जब हम वापस शहर जा रहे होंगे तो वो कोई शिकायत नहीं करेंगे न ही आपसे रुकने को कहेंगे। शुरू में रुकने को कहते थे तो आप उनपर चिल्लाते थे। अब तो उन्होंने कहना ही छोड़ दिया, वो मान चुके है की आपको सुनने की आदत नहीं।  मैं भी जानती हूँ की मेरी विनती का आप पर कोई असर नहीं होगा पर आज मैंने अपने मन की हर बात आपसे कहनी थी सो कह दी।

मेरी आपसे एक विनती है की मैंने माँ की मौत का ताना सहन किया है, पर अब बाबू जी की मौत का दोष दुनिया वाले मुझे न दें इसलिए जब तक बाबू जी इस दुनिया में है आप मुझे शहर  न ले जाये। ”  सुनहरी  दहाड़े  मार कर रोने लगी और भाग कर गाय की ओर चली  गयी।

सुनहरी की बातों ने रामपाल को अंदर तक हिला दिया था।  वो आज भी बेहतर जीवन का सपना पूरा करने का स्थान शहर को ही माने बैठा था। रामपाल भी सोचता हुआ घर से बाहर चला गया मानो वो निर्णय करने का प्रयास कर  रहा हो ।

तभी बच्चे भी दादा जी के साथ वापस आ गए थे।  सुनहरी ने ससुर को सुबह की चाय दी।  चाय पीते  पीते  धर्मवीर ने कहा  “बेटी रामपाल तो सुनता ही नहीं इसलिए मैं उससे कुछ नहीं कहता, लेकिन बेटी आज मैं तुझसे अपनी अंतिम इच्छा कहता हूँ।  बेटी मेरे अंतिम प्रवास में तुम रामपाल को गांव में ही रोक लो।  मैं उसी के हाथ अग्नि पाना चाहता हूँ। ”

ये सुन सुनहरी की आँखे भर आई।  ‘उसने बस इतना कहा पिता जी मैं प्रयास करुँगी। ”

शाम को रामपाल घर आया और सीधा पिता जी के पास जाकर बैठ गया।  आज न जाने कितने दिनों के बाद रामपाल ऐसे अपने पिता के पास आकर बैठा था उसे भी नहीं याद।  बहुत देर बैठने के बाद भी वो कुछ बोल नहीं पा रहा था, इधर उसके आँसू रुक नहीं रहे थे सुनेहरी भी पास ही खड़ी  थी।  धर्मवीर उसके आँसू देख कर समझ  गया था कि रामपाल कुछ पीड़ा में है ।

“कहो बेटा कोई काम है।” धर्मवीर ने पूँछा।

रामपाल रुंधे हुए मन से बड़ी मुश्किल से बोल पाया पिताजी मुझे माफ़ कर दो । मैंने आपके जीवन के दस अनमोल वर्ष को नर्क बना दिया।  मैं गांव में रहकर आपके साथ कंधे  से कन्धा मिलाकार आपके साथ खेती करता तो शायद माँ भी असमय हमे छोड़ कर न जाती। पिता जी अब मैं शहर नहीं जाऊंगा।  यहीं आपके चरणों में रह कर आपकी सेवा करूँगा। हम सब यहीं रहेंगे।  आपकी बहू ने आज मेरी आँखे खोल दी। इसने मुझे समझा दिया की जिस बहतर जीवन की तलाश में मैं शहर गया था वो जीवन तो मैं यहीं छोड़ गया था।

रामपाल का निर्णय सुनकर बच्चे, सुनहरी व धर्मवीर बड़े खुश हुए।

सुनहरी भी मन ही मन सोच रही थी, इससे बहतर जीवन और क्या हो सकता है। बच्चें अपने दादा से लिपट गए , सुनहरी की आँखें झरने लगी ।