भक्ति

जिंदगी बड़े ही उतार चढ़ाव से गुज़र रही थी, अब तो मौजी राम को भी इसकी आदत सी हो गई थी।  मोजी राम मंदिर के साथ वाली सड़क से अपने दो बैलों के साथ  खेत की ओर से लौट रहा था, मंदिर में भागवत का प्रवचन हो रहा था बड़े पहुंचे  हुए संत भागवत कथा सुना रहे थे। मौजी ने सोचा थोड़ी सा कथा का पुण्य ही ले लूँ , ऐसा सोच कर वो मंदिर में चला गया व्यास पीठ को दूर से ही प्रणाम कर जहां जगह मिली वहीं बैठ गया।  महात्मा जी उस समय जीवन व भगवान के सम्बन्ध में बता रहे थे।  महात्मा ने कहा – भगवन श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, “हे कौन्तेय तुम्हारे और मेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं, बस फ़र्क इतना है की मुझे अपने हर जन्म का स्मरण है और तुम्हें नहीं।  ये जो सामने तुम्हें अपने पितामह, भाई, गुरु जो दिख रहे हैं इनके भी अनेकों जन्म हो चुके हैं। हे कौन्तेय  जीवन मरण तो प्रकृति के अटूट  नियम है, जिसने जन्म लिया है वो मृत्यु को भी अवश्य प्राप्त होगा, यदि इस धर्म भूमि कुरुक्षेत्र में नहीं तो कहीं ओर, किन्तु मृत्यु तो अटल है।”

हे कौन्तेय तेरा कौन है और तू किसका है।  ये रिश्ते इस जन्म में हैं अगले जन्म में भी ये रिश्ते मिलेंगे या नहीं ये तो तुम्हारे हाथ में नहीं है।  इसलिए तुम अपना कर्म करो।  अपना गांडीव उठाओ और युद्ध करो क्योंकि इस रणक्षेत्र में तुम्हारा कर्म युद्ध करना है न की उसके परिणाम का चिंतन करना। इसलिए हे मित्र इस मोह का त्याग कर दो। ”

 

मौजी राम भागवत में मुग्ध हो गया वो भूल ही गया कि उसके बैल बहुत देर से मंदिर के बाहर वटवृक्ष से बंधे हुए हैं। मौजी राम अपने स्थान से ही व्यासपीठ को प्रणाम कर अपने स्थान से उठा और अपने बैलों को मंदिर के कुंए से पानी पिलाया।  दोपहर हो चली थी तो बैलों को उसने फिर से पेड़ की छांव में बांध खुद भी यहीं विश्राम करने का निर्णय लिया।

 

मौजी राम के जीवन में भी अब रिश्ते कहाँ  बचे थे समय के धर्मयुद्ध में वो अपना सब कुछ गवां चुका था।  उसका भरा पूरा परिवार था उसकी धर्म पत्नी के अलावा चार  बच्चे भी थे।  मौजी राम  सर के नीचे अंगोछे का तकिया लगाकर यही सोच रहा था कि वासुदेव भगवन कृष्ण ने कितनी अच्छी बात कही है, ” रिश्ते नाते सब मोह माया के बंधन हैं अर्जुन तू सब का त्याग कर मेरी शरण में आ और अपने कर्म को कर।”

 

मौजी राम सोच रहा है , ” मैंने तो  दस वर्ष पूर्व ही सब कुछ खो दिया मेरा आज न कोई अपना है न पराया अब इस बचे जीवन को मैं अपने प्रभु के चरणों की सेवा में लगा दूँ तो अपने अगले पिछले कर्मों को शुद्ध कर  लूंगा। आज मेरा दो रोटी के सिवाय कोई खर्चा भी तो नहीं है, ये दो बूढ़े बैल हैं जो मेरी सेवा करते करते बूढ़े हो गए हैं।  अब मैं और मेरे दोनों बैल अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। मेरे बैल तो बड़े स्वामी भक्त हैं इस बुढ़ापे में भी ये मेरा काम करते हैं, थके हुए बूढ़े शरीर की एक पुकार पर खड़े हो जाते हैं और मेरे हर इशारे को समझते हैं।  एक मैं हूँ जो आज तक अपने स्वामी को नहीं समझा,भागवत तो कई बार सुनी पर भगवान के उपदेश पर कोई विचार ही नहीं किया, मंदिर में सुना बाहर आकर उसपर कोई चिंतन नहीं न ही भगवन के उपदेशानुसार जीवन जिया। दस साल से तो ये दो बैल ही मेरे परिवार के सदस्य हैं।  इनके सहारे  ही जी रहा हूँ। मगर आज से हर कर्म भगवान  को ध्यान में रख उन्हीं को अर्पित करते हुए जीऊंगा । ”

 

मौजी  ने शपथ अनुसार जीवन जीना शुरू कर दिया, नित्य सुबह मंदिर में  भगवान् की सेवा मंदिर की साफ़ सफ़ाई, फिर घर जाकर घर की साफ़ सफ़ाई भगवान के लिए भोग बनाने के बाद ही वो कुछ खाता, मौजी भगवन गणेश का भक्त था। उसने भगवन की मूर्ति भी अपने खेत की मिट्टी  से ही बना ली थी। उन्हें जंगली फल फूल भी लेकर अर्पित कर  देता था।  बैलों के लिए सुबह ही सब व्यवस्था कर देता।  फिर खेत में मेहनत करता,  बैल भी पूरा साथ दे रहे थे। बैलों के खाने पीने का भी विशेष ध्यान रखता था।  उन्हें चारे के अलावा अनाज का दलिया  भी खिलाता था।  बड़ा उत्तम जीवन जी रहा था मौजी राम।

भगवान गणेश की बड़ी कृपा रही पांच साल और गुजर गए पर इन पांच सालों का उसे बड़ा सुकून था।  अब उसका मन बड़ा  शांत था।

 

इधर बुढ़ापा मौजी और उसके बैल दोनों को भारी पड़  रहा था,  भगवन की सेवा और बैलों की सेवा करना बड़ा मुश्किल हो रहा था , पर भक्त को हार कहाँ वो तो अपनी अतिम साँस तक अपने ईष्ट की सेवा करता रहता है।

 

गांव के अन्य किसानो की तरह ही मौजी भी अपनी रबी की फसल काट चुका था।  अब वो अपने जीवन यापन के लायक ही फसल बोता था बाकि   ज़मीन उसने  खाली छोड़ दी थी,  इस खाली ज़मीन में जंगली पेड़ बबूल, नीम,पीपल व  जंगली घास आदि उग आये थे।  बैलों को भी वो कई बार उस खाली ज़मीन पर घास चरने के लिए छोड़ देता था।

 

जयेष्ठ के महीने में लू लगने से मौजी की तबीयत बहुत ख़राब हो गई थी।  गांव के वैध जी ने कुछ जड़ी बूटियों से मौजी का जीवन तो बचा  लिया साथ ही उन्हें ज़्यादा काम न करने की सलाह दी। मौजी को कुछ दिन तक उसके पड़ोसियों ने खाना पानी दिया व बैलों की भी सेवा उन्हीं ने की।  मौजी का भगवान से भावात्मक लगाव और बढ़ता ही जा रहा था।  वो मानसिक रूप से ही उनकी सेवा में खोया रहता, आँख बंद कर कभी उन्हें भोग लगाता तो कभी सुलाता।  ये सारी  लीला करते करते उसकी आँखे भी नम रहती।

 

उसके पड़ोसी सोचते, “बेचारा अपने परिवार को याद कर दुखी रहता होगा अंतिम समय में जब शरीर बूढ़ा हो जाता है तो सब सेवा की आस करते हैं।”

वो उसे सांत्वना देते कुछ काम कर  देते और चले जाते।

 

आषाढ़ आया कुछ बारिश हुई तो सब गांव वाले अपने खेतों को जोतने निकल गए।  मौजी ने भी हिम्मत जुटाई और जुआ बैलों पर रख धीरे धीरे खेत पर पहुँच गया।  बैलों को हल से जोड़ एक चक्कर ही लिया था उसे खुद चक्कर आ गए वो बैलों को खोल पेड़ के नीचे जा बैठा और अपने ईष्ट गणपति जी से विनती करने लगा प्रभु अब न तो आपकी सेवा होती न ही अपनी, अब तो आपसे विनती है आप मुझे इस जीवन से मुक्ति दे दो। ऐसी प्रार्थना कर आँखें बंद किये भगवान गणेश को याद कर  रोये जा रहा था। रोते रोते कब उसे नींद आ गयी पता ही नहीं चला।

कोई दो घंटे बाद आँखें खुली तो देखा उसके खेत में हल चल रहा है, बूढ़े  बैलों को पर लग गए हों बड़ी तेजी से चल रहे हैं।  एक बड़ा तेजस्वी किशोर बैलों को चला रहा है।

मौजी उठा और उस बालक को पुकार के बुलाने लगा, ” अरे बेटा कौन हो ?

किशोर बोला, “बाबा अभी आकर बात करता हूँ बस आखिरी फेरा है।”

कुछ देर बाद किशोर बालक पास आया और बोला बाबा, ” बाबा मैं लुहार हूँ, गांव में पता चला की आप आधी ज़मीन पर ही खेती करते हैं, आधी खाली पड़ी है।  आपकी खाली जमीन में एक कुआँ  भी है, जिसमे भरपूर पानी है।  आपको कोई परेशानी न हो तो हम कुछ दिनों के लिए आपकी इस खाली ज़मीन में डेरा डाल लें। हमसे जो सेवा बनेगी, हम आपकी सेवा करते रहेंगे। बस  आप हमे कुछ समय के लिए यहां पड़ाव डालने की अनुमति दे दें तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। मौजी राम, ” बेटा भला मुझे क्या समस्या होगी ज़मीन खाली पड़ी है और मेरे किसी काम की भी नहीं तुम्हारा जी करे तो जीवन भर  यहां रहो, ज़मीन पर खेती करो, कमाओ खाओ।”

बेटा तुम्हारा नाम क्या है, ” बाबा वैसे तो सब मुझे विक्रम कहते है पर माँ प्यार से गणेश बुलाती हैं।”

गणेश नाम सुनते ही मौजीराम की आँखें भर आई, उसने आगे बढ़कर बालक को गले लगाया और खेत को जोतने के लिए शुक्रिया किया।

 

अगले दिन जब मौजीराम अपने खेत पर पहुँचा तो देखा उसके खेत के पास की खाली ज़मीन को साफ़ कर पीपल के नीचे गणेश व उसका परिवार ठहरा  हुआ है।

मौजीराम को गणेश को देखकर बड़ा सुकून  महसूस होता वो उसे निहारता रहता।  मौजी ने भी गणेश से कह कर उनके पास ही रहने की इच्छा  जताई, गणेश व उसके माता पिता ने मौजी के लिए भी एक छोटी सी झोपड़ी का निर्माण कर दिया।

मौजी को लगा जैसे भगवान ने अंतिम पड़ाव में उसे परिवार भी दे दिया।  अब वो बड़ा खुश  था और दिन भर भगवान के ध्यान व स्मरण में निकलने लगा।

 

एक दिन शाम को गणेश ने कहा, ” बाबा कल हम यहां से चले जायेंगे। ”

सुनते ही मौजी डर गया और सोचने लगा कि वो अकेला कैसे रहेगा।  तभी दुबारा गणेश ने बाबा का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए कहा, ” बाबा आप भी तो मेरे साथ चल रहे है।  आज आपका और हमारा अंतिम प्रवास है इन खेतों में, फिर हम यहां कभी वापस नहीं आएंगे। ”

 

ऐसा सुनकर मौजी की आँखों में आंसू आ गए उसने गणेश को अपने गले से लगा लिया। बड़े कस के बाबा ने गणेश को जकड लिया मानो  शरीर किसी बड़ी पीड़ा से मुक्त होने वाला हो। फिर धीरे धीरे बाबा के मुँह से गणेश का नाम मंद होता गया और गणेश की बांहों में मौजी का शरीर ढीला पड़ गया। मौजी की ज्योति तो अपने भगवान  में  समा गई पर शरीर अभी भी वंही पड़ा था।

 

सुबह गांव  के लोग खेत पर आये तो मौजीराम के पार्थिव शरीर को अकेला मूर्त  देख हैरान हो गए।  सारे गांव में खबर आग की तरह फ़ैल गई, सब उसकी झोंपड़ी पर इकट्ठा हो गए ।

 

उसके पड़ौसी हरिश्चंद्र ने गांव वालों को सम्बोधित करते हुए कहा , बेचारा अनाथ था, मैंने तो बहुत समझाया इस बुढ़ापे में अकेले खेतों पर रहना बेवकूफ़ी के अतरिक्त कुछ नहीं पर वो पागल हो गया था। कहता था,  “मेरे खेत के कुँए पर गणेश जी रहते है, वो भी सपरिवार वो मेरी सेवा करते हैं।”

 

दूसरा गांव वाला बोला,  “हम रोज यहां से आते जाते पर हमने तो कभी किसी को भी नहीं देखा एक झोपडी थी जिसमे ये रहता था।  खेत में इसने फल बोये हुए थे उन्हें ही खा कर  अब तक ज़िंदा रहा।  पूंछो तो कहता ये सारे फल और सब्ज़ियां गणेश ने बोये हैं, वो ही मेरी सेवा करता है। ”

 

तीसरा गांव वाला बोला, ” मरने की हालत तो उसकी आषाढ़ में ही थी फिर अकेले छः मास अकेले वो भी जंगल में उसने कैसे बिताये, लकड़ी के सहारे चलने वाला मौजी ने कैसे अपने सारे काम किये समझ से परे है।”

 

इतने में अन्य गांव वालों ने चिता तैयार कर ली और एक बालक मुखिया के पास आया और बोला,  “बाबा चिता तैयार है.”

 

सबने चिता पर मौजी का पार्थिव शरीर लिटा दिया।

सब आपस में बात कर  ही रहे थे, इतने में बालक ने मुखाग्नि भी दे दी और कुँए की ओर चला गया।

 

अचानक उनमे से एक आदमी बोला, “अरे वो बालक कहां गया।”

 

सब ढूंढ़ने लगे पर किसी को कुछ न मिला न ही ये पता चला कि वो बालक गांव का ही था या कही बाहर से आया था।