बंजर कारखाने

“आप आ गए, मैं आपके लिए चाय बना लाती हूँ, तब तक आप हाथ मुँह धो लीजिये तौलिया भी वहीं रखा हुआ है।” कहते हुए सीमा जल्दी से रसोई की और चली गई।

प्रमोद भी थका हुआ था उसने ऑफिस की ड्रेस उतारी और जल्दी से हाथ मुँह धो आया। तौलिया से हाथ मुँह पोंछता हुआ रसोई की तरह चलते हुए बोला, ” सीमा कलकत्ता में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।”

सीमा ने उबलती चाय को देखते हुए पूँछा, “क्या हुआ हमारे कलकत्ता को सब ठीक ही तो है।”

प्रमोद लम्बी सांस लेकर,” कहाँ कुछ ठीक है जब से नई सरकार बनी से तब से कंपनी मालिक और कंपनी यूनियनो के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।  सभी बड़ी कम्पनियों में हड़ताल का माहौल बन रहा है। यूनियन लीडर्स के ऊपर सरकार का हाथ है, मैंने तो सुना है कई जगह तो सरकार में इलेक्शन जीत के चुने हुए नेता ही यूनियन लीडर्स को भड़का रहे हैं।”

सीमा चाय की ट्रे लेकर आँगन की और चलते हुए, ” क्या सरकार नहीं चाहती रोजगार के साधन बढ़ाना यदि कंपनी और मजदूरों में दुश्मनी हो जाएगी तो इसमें कंपनी मालिक और मजदूर दोनों का बुरा होगा, सरकार को तो ऐसी हालत में दोनों पक्ष को समझाना चाहिए और समस्या का समाधान खोजना चाहिए ।”

प्रमोद चाय पीते हुए, “सीमा तुम पढ़ी लिखी हो पर कितनी भोली हो, अब बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार है और ये पूंजीपतियों से नफरत करती हैं, उन्हें गरीब मजदूरों का शोषक मानते हैं। हम कलकत्ता में कई पीढ़ी से रह रहे हैं, आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ पर आज  जो भी हो रहा है प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष रूप से सरकार इसके पीछे है।”

सीमा- प्रमोद का इन सब बातों से मन हटाने के लिए बोली,” चलो बाजार घूम आते हैं घर में सब्जी भी ख़त्म हो रही है वो भी लानी है।”

“तुम ही चली जाओ आज मन ठीक नहीं है” प्रमोद बड़े उदासी भरे मन से बोला।

अरे ! चलो भी, ये समस्या तुम्हारे अकेले की थोड़ी है, यदि कर्मचारियों को अपना भविष्य इन कंपनियों को उजाड़ने में दिख रहा है,  तो देखना इन्हे एक दिन पछताना पड़ेगा जब सब कंपनी बंगाल छोड़ के दूसरे प्रांतों में चली जाएँगी।  आपको तो चिंता करनी ही नहीं चाहिए ये समस्या  बड़ी कंपनियों की है आप तो छोटी सी मिल में सुपरवाइजर हो कुल 15 कर्मचारी ही तो हैं , आपके मालिक भी इतने अमीर नहीं की यूनियन बड़े उद्योगों को छोड़ आपकी मिल पर ताला लगवा देगी।”

 

“अच्छा चलो भाई वर्ना तुम यूँ ही लेक्चर देती रहोगी।” प्रमोद ने उठते हुए कहा ।

 

बाजार में सब्जी मार्किट का दृश्य

 

“भैया एक किलो आलू और एक किलो टमाटर तौल दो”

“बहन जी दो – दो किलो ले लो सब माल बड़ा सस्ता है। 20 पैसे का किलो है, आपको तो पता है कभी 50 पैसे किलो से कम न आलू बेचा न टमाटर क्या पता कल को शहर में दंगे हो जाएँ और कर्फ्यू लग जाये’ सब्जी वाले ने गंभीर होते हुए कहा।

 

“क्या हुआ भैया” प्रमोद ने गंभीर होते हुए पूंछा।

 

“आपको तो पता है यहां सभी बड़ी कंपनियों में पिछले छः महीने से हड़ताल हो रखी है। हमारे तो ज्यादातर ग्राहक कंपनियों के कर्मचारी ही हैं, हड़ताल होने से सब अपने अपने गांव चले गए। अब तो लगता है हमे भी बोरिया बिस्तर समेटना पड़ेगा।” सब्जी वाले ने बड़े दुखी मन से बोला।

 

“साहब वो देखो वो सामने इंजीनियरिंग का कारखाना है, उसमे कल से ही हड़ताल हुई है, सुना है यूनियन वालों ने सुपरवाइजर और मालिक को बहुत मारा है, पता नहीं साहेब बेचारे कहीं मर ही न गए हों। वो सुपरवाइजर साहेब भी मुझ से ही सब्जी ले जाते थे। आप भी तो किसी मिल में सुपरवाइजर हैं न, साहेब?” उसने बड़े गंभीर भाव से सवाल पूंछा।

“हाँ मैं भी सुपरवाइजर हूँ पर हमारा इतना बड़ा कारखाना नहीं है छोटी सी मिल है कुल पंद्रह कर्मचारी हैं” फटाफट उसे पैसे दिए और सब्जी लेकर चलने लगा।

 

इतने ही मजदूरों का एक दल कम्युनिस्ट का लाल झंडा लिए वहां से गुजरा शायद उस इंजीनियरिंग कारखाने के ही मजदूर और यूनियन वाले होंगे वो बड़ी जोर जोर से नारे लगा रहे थे “अमर नाम तोमार नाम वियतनाम -वियतनाम ” आमार बारी तोमार बारी नक्सलबारी- नक्सलबारी”

 

“दूर दूर तक कोई पुलिस वाला भी नहीं दिख रहा है सीमा चलो जल्दी घर चलो यहां ज्यादा देर रहना ठीक नहीं” मैंने अपने डर को काबू में करते हुए सीमा से कहा ।

हम अपनी गली में घुस ही रहे थे, अमर बाबू अपने घर के बाहर गली में घूमते दिखाई दिए। शाम हो आई थी गर्मी के दिन थे, इसलिए अभी थोड़ा उजाला था।

अमर बाबू ने मुझे देखते ही कहा “प्रमोद कैसे हो”

 

“भालो दादा अ ….  दादा प्रणाम।  आप बताओ दादा, आप कैसे हैं। ”

 

“प्रमोद सामान रख कर आओ तुमसे जरुरी बात करनी है।” अमर बाबू ने कुछ गंभीर होते हुए कहा ।

“जी दादा अभी आया” मैं सीमा के साथ घर में गया और फटाफट सारा सामान रख कर सीमा से बोला “तुम खाना बनाओ तब तक मैं अमर बाबू से बात कर आता हूँ, पता नहीं आज क्या काम आन पड़ा ऐसे तो आज तक नहीं बुलाया ।”

 

(अमर बाबू एक कम्युनिस्ट है घर के बाहर वाले कमरे को अपना ऑफिस बना रखा है, कंपनियों के यूनियन वाले इनके पास आते जाते रहते हैं।  देखने में बड़े गरीब हैं जैसे खाने को रोटी भी न मिलती हो ज्यादा तो नहीं पता पर इन्होने बहुत संपत्ति अर्जित की हुई है।  कारखाना चलेगा या नहीं चलेगा तो कितना रोकड़ा देकर चलेगा ये सब अमर बाबू तय करते हैं, जब से कम्युनिस्ट सरकार आई है तब से तो इनके तेवर ही अलग हैं, सुना तो ये भी है ये जो वसूलते हैं ऊपर तक जाता है।  वैसे इनका व्यवहार बाहर कैसा भी हो पर मोहल्ले वालों से बड़ा आत्मीय व्यवहार है,  मैं जल्दी से उनके पास गया वो बाहर बरामदे में कुर्सी पर बैठे थे )

 

“अमर बाबू प्रणाम आपने बुलाया दादा कोई जरुरी काम था” मैंने कुर्सी सरकाते हुए कहा ।

 

“प्रणाम प्रमोद, नहीं कोई जरुरी काम नहीं था आज खाली था सोचा तुमसे कुछ बात कर लूँ, तुम्हें कई दिन के बाद देखा है बैठो।” औपचारिकता भरे स्वर में अमर बाबू ने कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा।

 

मैं उनके कुर्सी पर बैठ गया वो आगे बोलते गए ……..

 

“प्रमोद किसी बात की कोई चिंता मत करना अब सरकार तुम्हारे दादा की ही समझो, कभी किसी भी प्रकार की कोई मदद की जरुरत हो तो बता देना ।

सुना है तुम जिस मिल में काम करते हो उसका मालिक कोई मारवाड़ी है, क्यों? क्या नाम हैं उसका ?

 

“जी, सेठ घनश्याम दास मारवाड़ी ही हैं।” मैंने बड़ी दबी आवाज में कहा।

 

“प्रमोद तुम्हे क्या लगता है ये मारवाड़ी, मराठी हम पर एहशान कर रहे हैं ? आज ये जितने अमीर हैं वो सब हम बंगालियों की वजह से हैं , इन्होने बहुत खून चूँसा  है हमारे बंगाली भाइयों का।  मगर अब नहीं, अब इन्हे हमारा हक़ देना होगा।  हमें मालिक होना चाहिए इन सब कारखानों का या लाभ में मजदूरों की भी हिस्सेदारी होनी चाहिए सब बराबर के हक़दार। सही कहा न मैंने, तुम क्या सोचते हो ?”

 

(ये सवाल पूँछ कर उन्होंने मुझे बड़े संकट में डाल दिया यदि मैं असहमति में जवाब दूँ तो मुझे भी हानि हो सकती है क्योंकि कम्युनिस्ट विपरीत सोच वालों को बड़ी जल्दी अपने रस्ते से हटा देतें हैं, मैंने देखा भी है कैसे बंगाल में अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों की हत्या होती रही हैं, मैं कोई विरोध नहीं चाहता था इसलिए चुप ही बैठा रहा ।)

”आप बड़े हैं दादा मुझे इतना ज्ञान नहीं,” मैं इतना कह कर चुप हो गया।

 

आज दादा बड़े अच्छे मूड में थे वो अपनी और अपने कम्युनिस्ट विचारधारा वाले यूनियन लीडर्स की कहानी सुनाने लगे वो बोले “आज एक कंपनी एग्जीक्यूटिव की कार पर कुछ लोगों ने बम्ब मार दिया, एग्जीक्यूटिव और उसका मालिक गंभीर रूप से घायल हो गए।  प्रमोद ऐसी घटनाएं इन कंपनी और फैक्ट्री मालिकों में दहशत पैदा करेगी इनमे जब तक मौत का डर नहीं पैदा होगा ये अपना लाभ कभी भी मजदूरों में नहीं बाटेंगे।”

हाँ एक बात और प्रमोद कल तो कमाल ही हो गया कल बड़े बड़े उद्योगपति हमारे मंत्री से मिले उन्होंने पावर कट, यूनियन और मालिकों की समस्याओं में हस्तक्षेप करने को कहा,  तो पता है मंत्री ने उन्हें टका सा जवाब दे दिया।

 

“क्या कहा मंत्री जी ने।” मैंने उत्सुकतावस् पूंछा

 

उन्होंने कहा,

“Capitalists were class enemies, and he should expect no sympathy.”  अमर बाबू ने बड़ी उत्सुकता भरी आवाज में मुझे बताया उनकी आँखों में पूंजीपतियों के लिए घृणा के भाव दिख रहे थे।”

 

इतने में उनके घर से आवाज आई “पापा खाना लगा दिया है जल्दी अंदर आ जाओ।”

 

अमर दादा ने मुझे भी अंदर आने के लिए आग्रह किया पर मैंने बड़ी विनम्रतापूर्वक कहा ,” सीमा भी राह देख रही होगी, उसने भी खाना बना लिया होगा आपके साथ फिर कभी,”

 

“ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा” और अमर बाबू अंदर चले गए मैं भी अपने घर आ गया।

 

सीमा ने जाते ही पूँछा, “क्या कह रहे थे अमर बाबू”

 

मैंने कहा “पहले खाना लगाओ बड़ी भूख लगी है।”

 

खाना खाते हुए में सीमा के सवाल का जवाब दिया ,” सीमा आज अमर बाबू की बातों से मुझे समझ आ गया की बंगाल के बुरे दिन आ गए हैं और हमारे भी बंगाल में भुखमरी और बेरोजगारी पसरने वाली है।

“वो कैसे?” उसने बड़ी उत्सुकता से पूँछा ।

”सीमा बंगाल सरकार उद्यमियों को दुश्मन की तरह  देख रही है, वो उन्हें निम्नवर्ग के दुश्मन के रूप में देखती है।  सरकार बिलकुल पूंजीपतियों की मदद के लिए तैयार नहीं है।  जितने भी हमले पूँजीपतियों पर हो रहे हैं उसके लिए सरकार ही जिम्मेवार है।  सरकार ने पुलिस को भी रोक रखा हे की यूनियन और कम्पनी मालिकों के बीच में न पड़े।  कल जब हम सब्जी खरीद रहे थे उस समय जिस कंपनी की सब्जी वाला बात कर रहा था उस कंपनी के मालिक और एग्जीक्यूटिव को मजदूरों ने बहुत मारा पीटा है दोनो अस्पताल में भर्ती हैं।  पुलिस भी नहीं आ रही किसी पूंजीपति को बचाने के लिए।

 

पता है सीमा कल हमारी मिल के सेठ ने भी इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है पता नहीं क्या बात है।  वैसे भी इन सब घटनाओं ने सेठ की चिंता बढ़ा दी है।”

 

“तुम्हे क्या लगता है क्यों मीटिंग बुलाई होगी “, सीमा ने उत्सुकता से पूंछा।

 

सीमा रघु, जो की मिल में सबसे वरिष्ठ कर्मचारी है, आजकल मजदूरों से बहुत बात करता है।  जब मैं राउंड पर होता हूँ तो वो काम करने का ढोंग करने लगता है। लंच में भी उन्हें लेकर बैठ जायेगा पता नहीं क्या पट्टी पढ़ा रहा है।

 

तुम पूँछ रही थी न क्या चिंता है तुम्हे ?  रघु ही मेरी चिंता है।  लगता है रघु को लेकर ही सेठ भी चिंतित हैं और इसी लिए कल मीटिंग रखी है।  अब सो जाओ मुझे कल बहुत काम है।”

 

इसी चिंता में, पता ही नहीं चला कब नींद आ गई।

 

सुबह  रोज की तरह सीमा ने मेरा लंच पैक कर, मेरा बैग मुझे दिया।  मैं अभी गली के कोने पर ही पहुँचा था की रघु मुझे अमर बाबू के आँगन में खड़ा दिखाई दिया।  मुझे देखकर वो अमर बाबू के ऑफिस में घुस गया,  उसे पता नहीं चला की मैंने उसे देख लिया है। ख़ैर अब मेरी समझ में आ गया की रघु की खोपड़ी में क्या सडयंत्र पल रहा है?

 

अमर बाबू यूँ तो मुझे कई बार गली या बाजार में मिले हैं पर कभी घर बुला कर बात नहीं की, मगर कल तो उन्होंने घर बुलाकर बहुत बात की,  मेरे सेठ का बायोडाटा व् मिल के बारे में बहुत कुछ पूँछा |

अब मैं समझ गया बड़ी कंपनी ही नहीं अब तो इन वामपंथिओं ने छोटी कंपनी व् मीलों को भी बर्बाद करने का खड्यंत्र शुरू कर दिया है। इसी उधेड़बुन में,  मैं कब मिल पहुँच गया पता ही नहीं चला।

जैसे ही मिल के द्वार पर पहुँचा।  “नमस्ते सर जी” वॉचमन वीर बहादुर ने मेरा ध्यान भंग किया।

“सर जी सेठ ने आपको सीधे अपने कक्ष में बुलाया है” बहादुर ने जोर से कहा।

मैंने पूँछा “सेठ आ गए। ”

“साब जी वो तो आज 7 बजे ही आ गए थे, तब से कई बार गेट पर आकर आपके बारे में पूँछ चुके हैं।”

 

मैंने घडी देखी 8:55 ही हुए हैं, ऑफिस का टाइम तो 9 बजे का है।  आज सेठ इतनी जल्दी क्यों आ गए? मैं खुद से सवाल करता हुआ उनकी ऑफिस में पहुँच चूका था।

“प्रणाम सेठ”

प्रणाम प्रमोद,  बैठो।  कैसे हो ?

ठीक हूँ सेठ जी, आप कुछ चिंतित दिखाई पड रहे हो।

हाँ, कल छुट्टी के समय रघु आया था,  उसने ये पत्र दिया था। ये पत्र किसी वामपंथी लीडर अमर ने रघु के हाथ भेजा था, इसमें लिखा है मिल चलानी है तो हर महीने रघु के हाथों एक लाख रूपये भिजवाने होंगे। प्रमोद तुम तो सुपरवाइजर के साथ साथ मिल के अकाउंट का काम भी देखते हो।  इतना पैसा हर महीने देकर मैं तो बर्बाद हो जाऊंगा।  मैं और मिल  मालिकों के मुकाबले 10 टका तनख्वा वैसे भी ज्यादा देता हूँ।

तुम ही कोई रास्ता बताओ मैं अब क्या करूँ ? मुझे तो लगा था कि ये आग सिर्फ बड़ी कंपनियों तक रहेगी, हम छोटे छोटे उद्योग वालों को कम्युनिस्ट कुछ नहीं कहेंगे  और हमारा काम चलता रहेगा। तुम्ही बताओ अब मैं क्या करूँ?  मिल का सारा प्रॉफिट इन्हे दे दूंगा तो मुझे मिल चलाने का क्या फायदा ?

मुझे तो लगता है इसमें रघु की ही कोई चाल है, मनोज बता रहा था की आजकल वो दूसरे कंपनियों के यूनियन लीडर्स से भी मिलता है।” सेठ चुप हो गए और प्रमोद की ओर देखते हुए चिंता में सर खुजलाने लगे।

 

“सेठ जी आज ही मैंने उसे अमर बाबू के यहां देखा था, वो भी सुबह सुबह । दफ्तर आते हुए मैंने उसे अमर बाबू के बरामदे में खड़ा देखा था।” प्रमोद ने तुरंत सेठ से बोला।

 

सेठ चिन्ता में, “समझ गया, जो में सोच रहा था वो ही हुआ है, ये सब रघु का ही करा धरा है।  प्रमोद देखो तुम मेरे विश्वसनीय कर्मचारी हो तुमसे कुछ छिपा नहीं है, सुना है ये जितने भी कारखानों का घिराव हुआ है या मालिकों पर हमले हुए हैं, इन सभी घटनाओं को करने वालों पर सरकारी संरक्षण है, इसलिए अभी तक एक भी यूनियन लीडर को पुलिस ने नहीं पकड़ा है।

 

प्रमोद मेरा एक प्लान है, इतने घाटे में ये प्लांट नहीं चला सकता मैं इस कारखाने को एक महीने में बंद कर दूंगा और गुजरात में नया कारखाना खोलूंगा।  मैं एक मारवाड़ी हूँ मेरे वहां रिस्तेदार हैं, कल मैंने वहां बात भी कर ली है। तुम्हे मेरा ऑफर है की तुम भी मेरे साथ चलो तुम्हारे पास एक महीना है सोचने का, तब तक में अमर को रघु के हाथों कुछ पैसे भिजवा दूंगा, ताकि कोई लफड़ा न हो।“

 

“जी, सेठ जी आप चिंता न करें मैं इसका जिक्र किसी से नहीं करूँगा, रही मेरा आपके साथ चलने की बात तो उसका निर्णय तो मुझे सीमा से बात करके ही लेना होगा।” प्रमोद सर खुजलाते हुए बोला।

 

“ठीक है प्रमोद आराम से सोच लो तब तक मैं रघु से मामले को कम से कम पैसों में सेटल करने की कोशिश करता हूँ।  लफड़े से अपना ही नुकसान होगा।“

 

“जी सेठ जी” प्रमोद ने सर हिलाते हुए कहा।

 

“सुनो रघु को भेज देना”, बाहर जाते प्रमोद से सेठ जी ने कहा।

थोड़ी देर बाद

“सेठ जी प्रणाम, अंदर आ सकता हूँ?” रघु सेठ से पूँछते हुए।

 

अरे! आओ रघु आओ कैसे हो ? बैठो बैठो।

अरे! रघु जितना उन्होंने माँगा है, उतना तो मिल का महीने का प्रॉफिट भी नहीं तुम तो हमारा सबसे पुराने कर्मचारी हो, तुम सब हमारा परिवार हो। तुम जानते हो जब पिछली बार तुम लोगो ने हड़ताल की थी तभी मैंने तुम्हारी सारी बातें मान ली थी।  आज इस मिल के सभी कर्मचारी को दूसरी मिल के कर्मचारियों से ज्यादा तनख्वा मिलती है। बोलो मिलती है न ?”  सेठ ने रघु को समझाने के मकसद से कहा।

 

“हाँ सेठ मिलती तो है पर अमर बाबू को कैसे समझाऊँ, उनकी पहुँच बहुत ऊपर तक है और वो प्रमोद की गली में ही रहते हैं आप प्रमोद से ही कहिये उन से बात कर लेगा। मैंने सुबह उनसे बात की थी।

मैंने उनसे कहा था, “मिल बहुत छोटी है दादा इतना रोकड़ा हमारा सेठ कहाँ से लाएगा।”

रघु ने बड़े अनमने भाव से कहा।

 

“तो – तो क्या कहा अमर बाबू ने?” सेठ ने बड़ी उत्सुकता से पूँछा ।

 

“सेठ जी उन्होंने 80 हजार बोला है, इससे नीचे बिल्कुल नहीं जाने को बोला है और आज शाम को पैसे लेके आने को बोला है। साथ ही बोला है कि अगर सेठ को कुछ हो गया तो इतना तो अस्पताल का बिल बन जायेगा।” रघु ने धमकी के स्वर में कहा ।

 

“अरे रघु ऐसा क्यों बोलता है भाई,  मैंने कब मना किया है देने को।  सुनो तुम 40 ले जाओ, सेठ जी गड्डी निकलते हुए बोलते हैं, बाकि मैं प्रमोद के हाथ 15 दिन में भिजवा दूंगा ।“सेठ ने नरमी बनाने के लिहाज से रघु के मूड को भांपते  हुए कहा।

“ठीक है सेठ जी मैं अमर बाबू को समझाने की कोशिश करूँगा वैसे वो किसी की सुनते नहीं हैं, पर फिर भी मैं आपके लिए जरूर उनसे 15 दिन का समय लेने प्रयत्न करूँगा, लेकिन सिर्फ 15 दिन और हाँ प्रमोद को इस लफड़े में मत डालो, सेठ जी वो सीधा साधा आदमी है । आप मुझे ही दे देना मैं पहुंचा दूंगा।”

रघु उठते उठते बोला।

 

रघु के जाने के बाद सेठ जी ने प्रमोद को बुलाया

 

“प्रमोद देखो मैं एक हफ्ते में गुजरात के लिए निकल जाऊंगा, तुम्हे मजदूरों की तनख्वा व चालीस हजार अमर बाबू को देने के लिए देकर जाऊंगा।  तुम महीना पूरा होने पर सबकी तनख्वा दे देना व् चालीस हजार अमर बाबू के पास लेकर जाना इसमें से तुम जो बचा लो वो तुम्हारा इंसेंटिव समझ कर रख लेना मैं जिस काम से जा रहा हूँ उसे पूरा करते ही आ जाऊंगा।  हो सकता है अगले पंद्रह दिन में ही आ जाऊं, फिर भी में मिल में लफड़ा नहीं चाहता,  इसलिए सारी जिम्मेवारी तुम्हे देकर जा रहा हूँ।”  सेठ ने प्रमोद को समझाते हुए कहा।

 

ठीक है सेठ जी मैं पूरा ध्यान रखूँगा और चालीस हजार में कुछ बचा पाया तो बचाने का प्रयास करूँगा, क्या पता पड़ोसी है, थोड़ा बहुत आत्मसम्मान बचा हो अमर बाबू में।” प्रमोद ने थोड़ा उदास होते हुए कहा।

 

शाम को प्रमोद ने सीमा को सारा हाल जा सुनाया साथ ही उसने  पूँछा, “क्या सोचती हो नए प्रदेश में चलने के बारे में ?”

सीमा ने कहा, “जहां बेरोजगारी धीरे धीरे पैर पसार रही हो वहां कोई  इंसान किस दम पर रह सकता है ?  देख लेना ये जितने भी गले में लाल पट्टा डाले आज कुत्तों की तरह अपने ही कारख़ानो को नौच नौच कर खा रहें हैं, एक दिन भीख मांगेंगे या हाथ रिक्शा चलाएंगे। आप सोचो आप क्या काम कर सकते हो? मकान  मालिक महीना पूरा होते ही आँगन में आ बैठता है। मैं तो सामान पैक कर रही हूँ सेठ जी हमारे दुःख सुख में हमेशा सहारा बने हैं आज हम उनका सहारा बनेंगे और यहां जो उजड़ेगा उसे गुजरात में बसाने के लिए सेठ की मदद करेंगे।  जब सेठ जी आएं तो उन्हें बोल देना की हम भी उन्ही के साथ चलेंगे।”

प्रमोद मन ही मन सीमा की समझदारी और दूर दृस्टि पर खुस होते हुए बोला, “ठीक है भाई ठीक है, तुमने तो मेरे मन की बात कह दी मैं भी यही सोच रहा था यहां बिना काम के कैसे जियेंगे।”

पन्द्रह दिन पुरे होने पर प्रमोद शाम को अमर बाबू के घर गया।

अमर बाबू कैसे हैं आप।

“मैं तो ठीक हूँ पर तुम्हारे सेठ जी कहाँ गायब,  रघु बोल रहा था ऑफिस में किसी को कुछ नहीं पता कहाँ गए भाई उनके पास हमारी कुछ अमानत रह गई थी जो सेठ जी ने आज देने का वादा किया था।” अमर बाबू थोड़ा रौब में दिखते हुए।

“जी अमर बाबू वो सेठ अपने गांव गए हैं,  उनके परिवार में कोई शादी है जल्दी ही आते होंगे । आपकी बची अमानत में से आधी अमानत मुझे दे गए थे और बोले भी थे कि बाकि आते ही भिजवा देंगे।” प्रमोद ने गड्डी आगे बढ़ाते हुए कहा।

 

“भाई प्रमोद ये तो गलत बात है चलो कोई नहीं सेठ को आने दो अबकी हम खुद ही उनसे मिलेंगे और अच्छे से समझा भी देंगे, अच्छा तुम बोलो कुछ ठंडा गर्म लोगे ।”

“नहीं नहीं अमर बाबू अभी चाय पी थी, सोचा पहले आपकी अमानत दे दूँ ।” प्रमोद सकुचाते हुए बोला और वहां से निकल आया।

अगले दिन सेठ का नौकर प्रमोद के घर सन्देश लेकर पहुँचा ।

“प्रमोद बाबू सेठ ने आपके नाम ये चिट्टी भेजी है।”

 

प्रमोद ने चिट्टी ली और पढने लगा, ” प्रिय प्रमोद, मैं कलकत्ता लौट आया हूँ, मैं घर पर नहीं बल्कि होटल में ठहरा हुआ हूँ।  मैंने घर का सामान पहले ही पैक कर के गुजरात भिजवा दिया था। तुम मुझे सन्देश भेज दो की तुम्हे मेरे साथ चलना है या नहीं।  यदि तुम साथ चलोगे तो मैं तुम्हारी भी दो टिकट करा दूंगा।  एक सप्ताह में सब काम निबटा लो महीने की 29 तारीख को ही हम गुजरात के लिए निकल जायेंगे। तुम 29 तारीख को स्टेशन पर मिलना, मैं तुम्हे वहीं मिलूंगा।

 

प्रमोद ने सभी जरुरी काम एक सप्ताह में पूरे किये और महीने की 29 तारीख की शाम को सभी कर्मचारी की तनख्वा देते हुए प्रमोद बोला ।

“सेठ जी जरुरी काम से बाहर गए हुए हैं, आप सभी लोगों की सैलरी हमेशा की तरह ही आज भी समय पर दे दी गई है। कच्चा माल न आने के कारण कल मिल में कोई काम नहीं होगा। दूसरी मीलों में हड़ताल के कारण कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है, इसलिए दो दिन का अवकाश रहेगा। तब तक सेठ जी भी आ जायेंगे।”

 

सभी कर्मचारी अपनी सैलरी लेकर चलने लगे, प्रमोद उन्हें जाते देख सोच में पड़ गया कि,”इन अभागों  को ये भी नहीं की आज से ये बेरोजगार हो गए हैं,  कैसी कैसी सोच वाले लोग हैं, इस दुनिया में जिन्हे ये भी नहीं पता की कौन इन गरीबो का दुश्मन है और कौन इनका सहारा।  जिसे ये अपना सहारा समझे बैठे हैं, आज उसी सरकार की दमनकारी नीतियों के चलते इनमे से न जाने कितने भूखे सोयेंगे, कितने आत्महत्या करेंगे, कितने अपराध की दुनिया में उतर जायेंगे और न जाने कितने मेरी तरह अप्रवासी हो जायेंगे। बिना देखभाल के उपजाऊ धरती का बंजर होना तो सुना था पर कारखाने बंजर होते आज देखे  है।

 

रात 10 बजे प्रमोद और सीमा सेठ से रेलवे स्टेशन पर मिलते है और सेठ के साथ जिंदगी के एक नए सफर पर निकल पड़ते हैं।

अस्वीकरण (disclaimer) – इस कहानी के सभी पात्र व् घटनाएं  काल्पनिक हैं, यदि ये कहानी के पात्र किसी जीवित व्यक्ति से मिलते जुलते हैं  या कहानी  किसी घटना से मेल खाती है तो वो एक संजोग मात्र होगा।