चिंता  (बोध कथा  भाग -1)

फाल्गुनी अपने पति के साथ सुख पूर्वक उत्तर भारत के एक गांव हीरापुर में बड़े चैन आराम से जीवन व्यतीत कर रही थी।  फाल्गुनी बचपन से ही बड़ी धार्मिक व् उच्च विचारों वाली थी। उसने उच्च शिक्षा  प्राप्त की थी संस्कृत व्याकरण व् वेद शास्त्रों का भी उसने अध्ययन किया था।  उसे संतों के साथ वेद पुराणों पर चर्चा करना आदि बड़ा भाता था।

समय होने पर उसका विवाह हीरापुर के व्यापारी सेठ घनश्याम के पुत्र साधक से हुआ। साधक सिर्फ नाम का ही साधक था। उच्च शिक्षित था पर वेद शास्त्रों आदि का ज्ञान न था।  पिता के व्यापर में रूचि थी सो कभी शास्त्रों की तरफ ध्यान गया ही नहीं।

शादी के बाद फाल्गुनी के ज्ञान व हर काम में दक्षता होने के कारण वो शीघ्र ही परिवार की चहेती  बहु बन गई। वो आस पास की लड़कियों का खाली समय में शिक्षित करती व् समय पर घर का सारा काम भी कर लेती। उसके इन गुणों से उसकी सास रामकली उससे बड़ी खुश थी।

एक दिन सुबह के समय।

“अरे! फाल्गुनी जल्दी पानी गर्म कर दे मुझे और तेरे पिता को आज गुरु जी के आश्रम में जाना है।  तुझे तो पता है आज गुरु पूर्णिमा है।  पुरे वर्ष इन्हे गुरु के दर्शन का समय मिले न मिले पर आज के दिन तो ये जरूर जाते हैं।  अब तो हमारे गुरु जी की उम्र भी बहुत हो गई है , पता नहीं अगली पूर्णिमा को दर्शन होंगे के नहीं।“  रामकली ने फाल्गुनी से कहा।

“जी माता जी पानी गर्म कर दिया है बाबू जी ने तो स्नान कर लिया है उनके गुसलखाने से बाहर आने के बाद आप चले जाना।“ फाल्गुनी ने जल्दी जल्दी काम को समेटते हुए जवाब दिया।

“बहु क्या बात है ? आज किस बात की जल्द बाजी है हमारे जाने के बाद आराम से काम करते रहना।“  सास ने फाल्गुनी को टोकते हुए कहा।

“माता जी इस बार में और साधक भी आपके साथ गुरु जी के स्थान पर चल रहें है,  कल ही इन्होने पिता जी से आज्ञा ले ली थी, मैं आपको बताना भूल गई थी।“

अच्छा ! साधक ने आज्ञा मांगी।  वाह ! वो कब से धार्मिक हो गया? रामकली ने अचरज भरे स्वर में फाल्गुनी से पूँछा।

“माता जी मैं और आप नित्य मंदिर जाते हैं, कथा कहानी वेद शास्त्र आदि पर चर्चा करते हैं, ये रोज शाम को मुझ से पुँछते थे आज क्या किया, तो मैं रोज इन्हे वेद शास्त्रों से अच्छे अच्छे श्लोकों को सुना देती थी व् उनका अर्थ भी समझा देती थी। धीरे धीरे आपके नास्तिक बेटे मैं भी धार्मिक संस्कार का एक पौधा लग गया. इसलिए आज वो खुद गुरु जी से दीक्षा लेने की सोच रहें हैं।“  फाल्गुनी ने बड़े उत्साह से कहा।

रामकली खुश होते हुए, “बड़ा अच्छा  हुआ बहु तुमने इसकी बुद्धि सुधार दी ।

लगता है वही धार्मिक सनातन संस्कार का पौधा आज एक छोटा सा वृक्ष बन गया है जो इसने अपने  पिता से गुरु आश्रम चलने की आज्ञा मांग ली।

ठीक है बहु अब जल्दी से तैयार हो जाओ ताकि जल्दी से आश्रम जाकर शाम होने से पहले वापस आ सकें ।”

जल्दी जल्दी फाल्गुनी ने सब काम निबटाये,  तब तक रामु भी घोडा गाड़ी लेकर आ गया।

मालिक जल्दी चलो गर्मी बहुत है सूरज चढ़ने से पहले आश्रम पहुँच जाएँ तो बहुत अच्छा रहेगा, रामु ने सेठ से विनती की।

“हाँ! हाँ ! रामु बस चल रहे हैं,  पता है इस बार तेरे छोटे मालिक साधक भी चल रहा है, उसे भी गुरु की महिमा का भान  हो गया इस बार वो भी दीक्षा लेगा।“ सेठ घनस्याम ने खुश होते हुए कहा।

कुछ ही देर में चारों बग्गी मैं बैठ कर चल पड़े, आश्रम पहुंचे गुरु जी को भेंट अर्पण की।  साधक और फाल्गुनी ने गुरु से दीक्षा ली। आशाराम में विभिन्न प्रकार की सेवाँ दी , लंगर जिमाया।

शाम होने से पहले पूरा परिवार घर वापस आ गया।  अब तो घर में नित्य प्रतिदिन पूजा पाठ, वेद आदि का पाठ होता रहता था।  सेठ ने फाल्गुनी के लिए एक बड़ा सा कमरा भी तैयार करवा दिया ताकि वो वहां रोज गांव की लड़कियों को वेद आदि की शिक्षा दे सके।

गांव की लड़कियां जिस भी गांव में बहु बनकर जाती वहां ज्ञान की अलख जगा देती।

समय गुजरा फाल्गुनी के सास ससुर का देहांत भी हो गया परन्तु वो अपने प्रण पर चलती रही और लोगों को शिक्षित करती रही।

एक दिन फाल्गुनी ने देखा की साधक बड़ा चुप रहने लगा है। भोजन में भी मन नहीं लगता और न ही भजन में ध्यान लगता।

फाल्गुनी ने एक दिन पूँछ ही लिया।

“स्वामी क्या बात है, आजकल आप बड़े शांत रहने लगे हो। पूजा ध्यान में भी आपका मन नहीं लगता। भोजन भी आपका कम हो गया है। कृपया मुझे भी अपनी चिंता का कारण बता दें, क्या पता मैं आपकी कुछ मदद कर दूँ।“

साधक ने कहा, “नहीं फाल्गुनी कुछ नहीं है, तुम्हें बता दूंगा तो तुम भी व्यर्थ चिंता में पड जाओगी। तुम अपने काम पर ध्यान भी नहीं दे पाओगी।“

“फिर भी स्वामी आप मेरे पति हैं आपकी चिंता को जानना मेरे लिए जरुरी है, ताकि मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँ।“फाल्गुनी ने बड़े भावुक मन से कहा।

साधक ने फाल्गुनी को गंभीर व् चिंतित होते देख बोला।

“फाल्गुनी व्यापर में घाटा हो गया है, इसी चिंता में दिन रात दुखी रहता हूँ।“

“स्वामी कितना घाटा हो गया है ?”  फाल्गुनी ने सहज होते हुए पूँछा।

साधक गहरी साँस लेते हुए बोला, “पहले तो पांच पीढ़ियों के लिए पर्याप्त धन था पर इस घाटे के बाद बस दो ही पीढ़ी के जीने का ही धन बचा है।“

सुनकर फाल्गुनी को हंसी आई पर पति को गंभीर देख उसने अपनी हंसी को वश में करते हुए कहा, “ठीक है स्वामी कल हम आश्रम चलेंगे गुरु जी तो अब नहीं रहें, पर उनके पुत्र भी पहुंचे हुए संत हैं उनसे आपकी चिंता का कुछ निवारण पूंछेंगे।“

साधक ने रामु को अगले दिन चलने को तैयार रहने के लिए कहा।

अगले दिन फाल्गुनी ने जल्दी तैयारी कर ली, रामु भी समय से आ गया और दिन का प्रथम पहर ख़त्म होने से पहले वो आश्रम में पहुँच गए।

रामु ने सारी भेंट बग्घी से उतारी और आश्रम में ले गया, पीछे पीछे फाल्गुनी और साधक भी आश्रम  के अंदर चले गए।

वहां जाकर दोनों ने गुरु पुत्र को दंडवत प्रणाम किया और कहा, “प्रभु आपके आश्रम के लिए कुछ फल व् अनाज आदि लाएं हैं, कृपया स्वीकार करें।“

गुरु पुत्र ने एक शिष्य से कहा, “बेटा जरा जाकर तो देखो रसोई भंडार में कितना सामान है। ”

थोड़ी देर में शिष्य ने आकर बताया, ” गुरुदेव एक सप्ताह का भोजन हमारे पास है।”

गुरु पुत्र ने साधक और उसकी  धर्म पत्नी को देखते हुए कहा, “पुत्र आश्रम का नियम है की हम एक सप्ताह से ज्यादा की खाद्य सामग्री का संचय नहीं करते इसलिए मैं आपकी ये भेंट स्वीकार नहीं कर सकता। अगले सप्ताह क्या होगा कहाँ से इंतजाम होगा इसकी चिंता हमारे ठाकुर जी करते हैं।  यदि गुरु पूर्णिमा होती तो तुम्हारे मान के लिए जरूर कुछ रख लेता क्योंकि उस दिन के लिए ये नियम शिष्यों के सम्मान के लिए हटा लिया जाता है और शिष्यों से प्राप्त सभी सामग्री आश्रम की ओर से गरीबों को दान कर दी जाती है, परन्तु आज हम नियम अनुसार कोई भेंट नहीं ले सकते अतः आप वापसी में इस सामग्री को गरीब लोगों में बाँट देना।”

फाल्गुनी ने साधक की और देखते हुए कहा, ” आपको गुरु जी से कुछ पूँछना था ?

साधक भरी आँखों से फाल्गुनी की और देखते हुए, ” मुझे मेरी समस्या का समाधान मिल गया फाल्गुनी, अब घर चलो।“

गुरु पुत्र को प्रणाम कर आशीर्वाद ले दोनों अपने घर की और चल पड़े।

रास्ते में साधक के मुख पर धैर्य का तेज था वो समझ गया था की मेरे पास तो दो पीढ़ी का धन है और उस संत के पास तो इतने बड़े आश्रम में भी सिर्फ कुछ दिन का राशन मात्र है और फिर भी चिंता नहीं, बल्कि भगवन पर भरोसा है और एक मैं हूँ जिसको पीढ़ीओं की चिंता है।

ऐसा सोचते सोचते साधक अपने घर पहुँच गया, मेहनत से कमाता और खूब दान पुण्य भी करता अब उसे कोई चिंता नहीं थी।

पूरा जीवन दोनों दम्पति ने समाज सेवा करते हुए बिताया।