बोध कथा भाग – 2  (पत्थर)

 

धनिया हिमाचल के अपने छोटे से गांव लखीमपुर में बड़े आनंद से रह रही थी उसके दो बेटे थे हीरा और जोगी, दोनों ही बड़े मेहनती थे।  दोनों बच्चे अपनी माँ के हर काम में हाथ बटाते, इतने मेहनती बच्चे की खेत में काम करने के बाद घर में झाड़ू बर्तन व कई बार तो खाना तक बना देते।  सुबह सूरज से पहले उठना, आँगन बुहारना आदि काम वो अपनी माँ के साथ करवा दिया करते थे। एक छोटी सी पहाड़ी गैया जिसका नाम राधा था।  इतनी समझदार गैया थी की अपना नाम सुनते ही दौड़ी दौड़ी धनिया के पास आ जाती थी। हीरा और जोगी भी उसकी बड़ी सेवा करते थे।

समय बड़े आनंद से कट रहा था, दोनों भाई अपनी माँ के हर काम में  हाथ बटांते, घर आँगन  बुहारने से लेकर नले (पहाड़ से निकलने वाली प्राकृतिक शुद्ध पानी की धार) से पानी लाने तक सारे काम करते।  तीनो लोग सूरज के उगने से पहले उठ जाते और मिलजूल कर काम करते। जल्दी जल्दी काम निपटा कर दोनों भाई विद्धयालय चले जाते, वैसे तो विद्यालय उनके घर से दिखाई पड़ता था, परन्तु पहाड़ के टेड़े मेढे रास्तों से जाने पर पूरे चार कोस पैदल चलना पड़ता था।

दोनों भाई बड़े आराम से इस दूरी को रोज तय करते, पहाड़ों में इतना चलना तो आज भी आम बात है, परन्तु वो दोनों भाई तो राधा के बछड़े की तरह उछलते कूदते स्कूल चले जाते थे । वहां खूब मन लगाकर पढ़ते। स्कूल से लौटने के बाद बचे समय में माँ के साथ घर के पीछे खेत में काम करवाते और फिर अपने स्कूल का गृहकार्य करते । बीच बीच में धनिया के काम में भी हाथ बटाते रहते।

पहाड़ की जिंदगी कितनी भी कठिन हो परन्तु तीनो बड़े मजे से आने वाले हर पल को खूब हँसते खेलते जीते। अभावों में भी जीवन अपनी पूरी गति से आगे बढ़ा जा रहा था। खेत से इतनी आमदनी हो जाती थी की रोज का खाना खर्चा बड़े आराम से निकल रहा था।  इधर दोनों भाई भी बारहवीं पास कर चुके थे। दोनों बड़े मेधावी थे आगे की पढाई के लिए शिमला जाना था परन्तु धनिया दोनों का खर्च उठाने में असमर्थ थी।

रात में इस बात पर बड़ा विमर्श हुआ।

 

धनिया ने कहा, “तुम दोनों पढ़ने शहर जाओगे मैं अकेले तुम्हारा खर्चा भेज दिया करुँगी। तुम्हारे पिता होते तो मेरे लिए ये परीक्षा की घडी इतनी कठिन न होती परन्तु उनका सपना था तुम दोनों को ऊँची से ऊँची शिक्षा देना,  इसलिए मैंने सोच लिया है मैं तुम दोनों को शहर भेजूंगी।

“माँ माना की तुम बड़ी मेहनती हो पर अकेले हम दोनों का शहर में रहने खाने का खर्चा नहीं उठा पाओगी, यदि आप बीमार भी हो गई तो भी तो कोई आपकी देखभाल करने वाला चाहिए न, इसलिए बड़े भैया जायेंगे पढ़ने और मैं अपनी माँ के साथ मेहनत करूँगा। हम दोनों मिलकर एक जने का खर्चा तो उठा ही लेंगे।“ हीरा ने बड़े उत्साह से कहा।

“अच्छा बड़े भाई के होते छोटा न पढ़े ये कैसे हो सकता है, इसलिए शहर तू जायेगा और मैं माँ के साथ रहूँगा।” जोगी ने छोटे के सर पर हाथ रखते हुए कहा।

 

तीनो में चर्चा होती रही और न जाने कब तीनो सो गए,  सुबह उठे तो तीनो बड़े खुश थे मानो कोई निर्णय कर ही लिया हो।

जोगी ने हीरा के कपडे तय किये और एक झोले में डाल दिए।  माँ ने भी जल्दी जल्दी कुछ खाने के लिए बनाया।  गाय के घी का एक डब्बा कुछ मठरी व कुछ खर्चे के लिए रूपये हीरा को देते हुए जोगी ने कहा। शहर में जितना हो कम से कम खर्चे में काम चलना तुझे पता ही है हम गरीब हैं,  कुछ अच्छे कपडे ले लेना तुझे रोज कॉलेज जो जाना है अपने खाने पीने का पूरा ध्यान रखना किसी भी बुरी संगत  से दूर रहना।”

तीनो अपने बिछुड़ने के दुःख को दबाते हुए चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान लिए हुए थे,  आँखों में खुसी के आंसू। इतने में अपने आंसू पोंछते हुए धनिया ने मौन तोडा, “अच्छा अच्छा चलो जल्दी करो एक ही बस जाती है शहर, जोगी जल्दी से हीरा को बस में बिठा कर आ।”

 

हीरा ने माँ के चरण छुए आशीर्वाद लिया और दोनों भाई रोज की तरह घर से निकल गए पर आज वो स्कूल के लिए नहीं जा रहे थे,  इसलिए चाल भी बड़ी धीमी थी वो मस्ती, वो दौड़ तो मानो दोनों भाई आज भूल ही गये थे। धनिया भी आँगन से दोनों को तब तक देखती रही जब तक आँखों से दीखते रहे।

 

कुछ देर में वो बस स्टैंड पर थे, बड़े शांत भाव से एक दूजे को देखते व् बातें करते बस का इंतजार करते रहे। कुछ देर में बस आई और हीरा शहर चला गया।

 

वहां जाकर हीरा ने अपने रहने की व्यवस्था की और शिमला कॉलेज में दाखिला ले लिया।

 

इधर जोगी और धनिया दिन रात खेत में मेहनत करते सब्जी उगाते व पास के कसबे  में  बेचकर अपना खर्चा व हीरा को भी महीने का खर्चा भेजते।

“जोगी आज लगातार तीन दिन हो गए बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही। ऐसा कई वर्षों में हुआ है मुझे तो डर लग रहा है। ज्यादा बारिश में फसल तो ख़राब हो ही जाएगी साथ ही पहाड़ से पत्थर गिरने व् पहाड़ सरकने से कई बड़े हादसे तक हो जाते हैं ” धनिया ने रोटी बनाते हुए कहा।

“हाँ माँ मैं भी इसी चिंता मैं हूँ।“ जोगी ने जवाब में कहा।

 

तभी बड़े जोर की आवाज आई मानो कंही बिजली गिरी हो या पहाड़ से पत्थर लुढ़क गया हो।  जोगी ने  बाहर आकर देखा और उतनी तेजी से अंदर जाकर बोला।

 

“माँ माँ ! हमारे खेत की तरफ पहाड़ का कुछ हिस्सा सरक गया है लगता इस बार सारी फसल बर्बाद हो जाएगी।“ हांफते हुए जोगी ने माँ से कहा।

“कोई नहीं बेटा बारिश रुकने पर देखेंगे जो भगवन ने किस्मत लिखा है वो कोई नहीं छीन सकता, वो खुद भी नहीं।” बेटे को ढाढस बंधाते धनिया बोली।

 

कई दिन लगातर हुई बारिश से सारा गांव परेशान हो गया था सबकी फसलें नष्ट हो गई थी।

 

बारिश रुकने पर दोनों अपने खेत की तरफ गए, तो वहां के हालत देखकर धनिया को चक्कर आ गए व जोगी तो पसीने पसीने हो गया।

खेत तो कंही था ही नहीं,  था तो एक बड़ा सा पत्थर जो उनके खेत की जगह पर नजर आ रहा था ।  आस पास की जगह पर मलबा ही मलबा था फसल तो कंही दिख ही नहीं रही थी।

कुछ दिन में बारिश भी रुक गई साथ ही धनिया और जोगी की जिंदगी भी थम सी गई।  उधर हीरा को खर्चा  भी नहीं पहुँच पाया, पहुँची तो एक चिट्टी जिसमे सारी घटना लिखी थी।

कहतें जब सारे रस्ते बंद हो जाते हैं तो भगवन कोई न कोई रास्ता खोल देते हैं, वही हुआ भी रात को गाय राधा ने एक सुंदर से बछड़े को जन्म दिया।  धनिया और योगी के दुखी मन को कुछ खुशी मिली।

धनिया ने खुश होते हुए कहा, “हमारी राधा ने ऐसे दुःख के समय हमारा साथ दिया है जब हमे खाने के भी लाले पड़ने लगे हैं।  भगवन का लाख लाख शुक्र है अब इसका दूध बेच कर कुछ दिन तो खर्च चल जायेगा, तब तक…. ”

इससे पहले की धनिया कुछ कह पाती जोगी बोल उठा, ” तब तक में उस पत्थर के टुकड़े टुकड़े कर दूंगा, एक पत्थर को मैं अपनी किस्मत पर पड़े पत्थर की तरह सहन नहीं कर सकता।”

अगले दिन से जोगी ने पत्थर के आस पास का मलबा हटाना शुरू कर दिया।  कुछ ही महीनो में उसने मलबे में दबे खेत के कुछ भाग को साफ कर लिया और वहां थोड़ी बहुत सब्जियाँ लगा दी।

उधर हीरा भी आस पास के बच्चों को टूशन पढ़ाने लगा और उसने भी चिट्ठी लिख कर सिर्फ आधा खर्चा भेजने को कहा।

धनिया जो पहले रोज कसबे में सब्जियां बेचने जाती थी, आज वो वहां दूध बेचने जाती है।

लगातार बिना किसी की परवाह किये इधर दिन रात छेनी हथोड़े से थोड़ा थोड़ा कर के कुछ ही वर्षों में जोगी ने अपने खेत से पत्थर को भी तोड़ दिया, पत्थर के कब्जे से उसने अपने खेत को वापस ले लिया  और पहले की तरह खेती करने लगा।

जोगी पुरे पत्थर को साफ करके अपनी माँ के आस आया और बोला, ” देखा माँ मैं न कहता था की मैं अपनी किस्मत पर पड़े पत्थर को एक न एक दिन हटा के रहूँगा,  देख मैंने आज दैत्य रुपी पत्थर को हटा दिया।“

धनिया ने जोगी को गले से लगा लिया और रोज तुमसे न हो पायेगा कहने वाले गांव के लोगों का भी मुँह सिल गया।

धनिया ने कहा “बेटे मुझे तो विश्वास था कि तू उस पत्थर को तोड़ देगा, बस डर इस बात का था की कहीं गांव के लोग तेरे धैर्य को न तोड़ दें पर तूने जो साहस और धैर्य का परिचय दिया वो इस इलाके में एक मिसाल बनेगा देख लेना।“

जोगी के इस कारनामे के चर्चे आस पास के गांव में भी होने लगे।