मेरे कान्हा जाने

बलदेव अपने परिवार के साथ सकुशल रह रहा था।  सब कुछ ठीक चल रहा था परन्तु बलदेव हमेसा किसी न किसी परेशानी में उलझा रहता था या यूँ कहिये की वो कोई न कोई समस्या मोल ले लेता था।  समस्या किस घर में नहीं होती पर क्या उन्हें लेकर चिंता में पड़े रहना चाहिए या उनका समाधान निकालना चाहिए।  बलदेव के लिए तो कई बार समाधान भी  समस्या बन जाता था। एक बार गांव के पंडित जी बलदेव के छोटे भाई मोहन  के लिए रिस्ता लेकर आ गए तो बलदेव को परेशानी हो गई की शादी में आने वाले मेहमानो को कहाँ ठहराएगा, उनके रहने खाने की व्यवस्था कैसे होगी, शुक्र है भगवान  का की बलदेव के पिता  उस समय जीवित थे।

उन्होंने बलदेव से कहा था, “अभी में जिन्दा हूँ, और जैसे तेरी शादी बिना किसी समस्या के मैंने कराई वैसे ही इसकी भी करा दूंगा। तू अपने आप को संभाल इस तरह से जीवन नहीं चलता, तू तो जीवन जीने और जीवन में आने वाले रोजमारा के काम को ही समस्या मान लेता है।”

परन्तु बलदेव को क्या उसके लिए तो जीवन में समस्या ही होती हैं।

इधर बलदेव के उलट उसकी पत्नी का व्यवहार बड़ा मिलनसार किसी भी समस्या का चुटकी में समाधान कर देना उसे आता था, उसका सबसे बड़ा मन्त्र था कान्हा जाने। बलदेव जैसे पागल की पत्नी होना और उसे संभालना सिर्फ पार्वती के ही बस में था। उसके सवालों के जवाब उसकी हर समस्या का समाधान पार्वती ही करती थी। बलदेव पार्वती से इतने सवाल पूंछता की वो जवाब दे दे पागल ही हो जाये पर वो लम्बा चोड़ा जवाब ने देकर इतना कहती, “मेरे कान्हा जाने |

असल में बलदेव कुछ कमाता भी न था, इसी चिंता में रहता की कैसे कमाऊँ, मैं अकेला सब के लिए कैसे कमा सकता हूँ, परन्तु पार्वती को तो पता था कर्म के बिना तो चिड़िया को भी चुग्गा नहीं मिलता, इसलिए सिलाई कड़ाई का काम कर के घर का खर्च चला लिया करती। उसने कई बार बलदेव को समझाने का भी प्रयास किया पर उसके उलटे सीधे जवाबों से तो खामोसी ही अच्छी थी।

पार्वती और बलदेव की एक पुत्री भी थी ‘रीमा’ जो अब बड़ी हो रही थी, इधर बलदेव उसे बढ़ता देख सूख रहा था, उधर पार्वती उसे रोज मंदिर ले जाती और कान्हा से कहती, “देख लो आपकी भांजी दिन दिन बढ़ रही है।” इसे सद्बुद्धि दो और मुझे हिम्मत दो की मैं अपनी ज़िम्मेवारियों को आराम से पूरी कर लूँ।

मंदिर से निकलते ही रास्ते में कमला मौसी मिली और ——

“अरी बहु पार्वती कैसी हो? रीमा तो देखते ही देखते कितनी बड़ी हो गई। सारी जिम्मेवारी तुझे ही निभानी है बलदेव तो पुरे दिन यहीं इसी मंदिर के चबूतरे पर पड़ा रहता है कुछ करता भी नहीं पर हाँ उसे चिंता सबसे ज्यादा रहती है।” कमला मौसी ने टोका।

“जी मौसी सब कान्हा जाने, बलदेव तो बेमतलब में चिंतित रहते हैं पर मुझे कोई चिंता नहीं जो करना है वो कान्हा ने करना है, वो जो भी करते हैं हमारे कल्याण के लिए ही होता है।” पार्वती ने जवाब दिया।

“कह तो तू ठीक ही रही है बेटी पर विश्वास से ही काम नहीं चलता।” कमला ने अविश्वास भरे लहजे में कहा।

“अरे मौसी जी आप दिन रात कान्हा को पूजती हैं, फिर भी आपके अंदर विश्वास की लौ नहीं जली, मौसी आप कहती हैं उसकी मर्जी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता तो आप ही बताओ, ये सांसे भी तो उसी की मर्जी से चल रही हैं, फिर अविश्वास कैसा आप बिलकुल चिंता न करें वो सबका ख्याल रखता है और मेरा भी।”पार्वती ने धर्म का दृष्टिकोण स्पष्ट करने का प्रयत्न करते हुए कहा और आगे बढ़ गई।

कमला मंदिर की सीढ़ीओं की और बड़बड़ाते हुए बढ़ गई, “दोनों ही पति पत्नी एक जैसे हैं, एक को चिंता नहीं दूसरा पुरे दिन चिंतित रहता है और सबके सामने रोता रहता है, इनका तो भगवन ही मालिक है।

रीमा   ने भी अपनी शिक्षा के साथ साथ पार्वती से सिलाई कड़ाई व् अन्य रसोई और घरेलु कामों  को सीख लिया था।

एक दिन रीमा को घर के काम में लगाकर पार्वती सुबह नियम अनुसार मंदिर गई। भगवान श्री कृष्ण की पूजा व् प्राथना समाप्त कर वो सीधे पंडित जी के स्थान पर गई।

पार्वती ने पंडित जी को देखते ही।….. ”प्रणाम पंडित जी।“

प्रणाम बेटी कहो कैसे आना हुआ?

पंडित जी आप तो जानते ही हैं कि रीमा अब बड़ी हो गई है उसके लिए कोई कुलीन घर का वर आपकी नजर में हो तो बताना।

पार्वती लड़के तो नजर में है परन्तु तुम तो जानती ही हो की आजकल सब कितना मुँह खोलते हैं और तुम्हारे हालात किसी से छुपे भी नहीं है।

“जी पंडित जी, माँ बाप का फर्ज होता है अपनी बेटी के लिए होनहार वर की तलाश करना में वही कर रही हूँ आप अपना फर्ज पूरा करें मुझे कोई अच्छा लड़का बताएं, बाकि क्या है, क्या नहीं है वो आप मेरे भाई कान्हा पर छोड़ दें। मैंने तो उनसे भी आज इसके लिए कोई होनहार वर तलाशने के लिए कहा है।” पार्वती ने बड़े सरल भाव से कहा।

पंडित जी तुनक कर, “ठीक है तो वही ढूंढ देगा तेरी बेटी के लिए वर मेरे पास आने की क्या जरुरत थी।”

“पंडित जी बुरा न माने आप तो माध्यम हैं और ये काम भी आप उन्ही की कृपा से कर रहे हैं।

इतना कह कर पार्वती घर की और चल पड़ी।

 

कमला मौसी भी बैठी हुई थी पार्वती को जाते ही पंडित जी से बोली। “देखा पंडित जी कितना घमंड है, इसे ही कहते हैं घर में नहीं हैं दाने और अम्मा चली भुनाने।”

“सही कहा कमला बहन हर बात में कान्हा जाने, कान्हा जाने अरे सारे काम ही कान्हा जाने तो हम यहां बेफकूफ बैठे हैं। सारे गांव के लड़के लड़कियों के रिश्ते इस पंडित दीनानाथ ने ही कराएं हैं।  देखना कमला बहन एक दिन ये रोती  हुई मेरे चरणो मे आकर बोलेगी, “पंडित जी आप ही कोई सुयोग्य वर बता दीजिये कान्हा ने तो नहीं बताया।“  अब बहन  भगवान् तो हम पूजते हैं उनको कहाँ फुर्सत की वो सारे  जगत के काम करता फिरे , मनुष्य ही मनुष्य के काम आता है हाँ उसकी कृपा जरूर रहती है।” पंडित जी बड़े रोष में बोले

पंडित जी आपको पता है कल हमारे गांव में कलेक्टर साहब का दौरा है? कमला मौसी ने प्रश्न भरी आँखों से पंडित जी की और देखा ।

हाँ बहन सुना तो है कि हमारे हमारे गांव में सरकार कोई डिग्री कॉलेज बनाने की सोच रही है उसी के लिए उपयुक्त जमीन देखने के लिए कल कलेक्टर साहब का दौरा है।

अगले दिन कलेक्टर साहब अपने दल बल के साथ गांव में आते हैं व उपयुक्त जमीन चुनने के लिए गांव के सरपंच व बड़े बुजुर्गों के साथ मीटिंग करते हैं।

कलेक्टर साहब, “सरपंच और गांव के लोगों ने जो जगह कॉलेज के लिए हमें बताई है वो मेरे हिसाब से उपयुक्त नहीं है, वो हिस्सा नीचे है और बीडीओ  साहब ने बताया है वो हिस्सा हर साल बारिश में डूब जाता है।  इसलिए वहां तो कॉलेज नहीं बन सकता।  हमे कोई ऐसी जगह बताओ जो सड़क के पास हो और झील में न हो और जल भराव का खतरा भी न हो। बीडीओ साहब हम मौका देखना चाहते हैं आप हमें मुख्य सड़क पर सरकारी जमीन बताएं।  वहीँ हम देखेंगे कि वो जमीन उपयुक्त रहेगी या नहीं।”

 

जी सर सड़क किनारे सरकारी जमीन है पर सड़क से सीधे उस जमीन पर पहुंचने का रास्ता नहीं है, सीधा और छोटा रास्ता बनाने के लिए हमें गांव के कुछ लोगों की जमीन व् मकान लेने होंगे पता नहीं कोई अपना मकान देने को राजी होगा या नहीं। बीडीओ ने कलेक्टर साहब को जवाब दिया।

ठीक है बीडीओ साहब आप हमारे साथ अभी वहां चलिए हम देखते हैं की कॉलेज के लिए हमे कितनी जमीन गांव वालों से लेनी पड़ेगी और वो देने के लिए कितने तैयार हैं ये तो वहीँ जाकर बात करने से पता चलेगा।

 

सारे कर्मचारी सरपंच सब कलेक्टर साहब के पीछे पीछे उस स्थान पर पहुँचते हैं।

बीडीओ साहब इशारा करते हुए, “सर वो जमीन सरकारी है और ये एक बीघा खेत व उसमे बना घर हमे मिल जाये तो कॉलेज तक का रास्ता भी सीधा इसी सड़क से बन सकता है”

कलेक्टर साहब, “वो घर किसका है?”

इससे पहले कि चलाती बीडीओ साहब कुछ बोलते सरपंच ने जवाब दिया, “साहब वो घर बलदेव का है गरीब परिवार है इसी जमीन से उनका खाना खर्चा निकलता है व् उसकी पत्नी पार्वती कपडे सिलकर काम चलाती है।

उनकी एक बेटी भी है रीमा जो शहर के कॉलेज से स्नातक किया है, माँ बेटी समझदार है पर साहब बाप तो बिलकुल पागल है अगर इस जमीन को लेने की बात आपने कही तो वो पागलपन से मर ही जायेगा।

“ठीक है देखते हैं।“

इतना कह कर कलेक्टर साहब उनके घर की तरफ चल दिए।

छोटा सा एक कमरे का घर उसके आगे छोटा सा आँगन और बाकि जमीन में सब्जी आदि ऊगा रखी थी।

घर के दरवाजे पर पहुंच कर कलेक्टर साहब ने कहा, “कोई है अंदर।”

तभी अंदर से रीमा बाहर आई और इतने सारे लोगों को देख कर डरते हुए पूँछा आप…..?

 

“हम यहां के कलेक्टर हैं और तुम्हारे में कॉलेज बनाने के लिए हमे एक जमीन पसंद आ गई है, परन्तु उस जमीन पर कॉलेज तभी बन सकता है जब उस जमीन तक पहुंचने का रास्ता सीधा व् सरल हो, सरकारी नक्से के हिसाब से उस जमीन तक जाने का रास्ता झील से जाता है और झील वाले रास्ते में हर वर्ष वर्षा ऋतू में पानी भर जाता है।“

 

कलेक्टर साहब बोल रहे थे तभी पार्वती भी पीछे आकर खड़ी हो गई थी और सब सुन रही थी।

 

“लेकिन हम आपकी कैसे मदद कर सकते हैं।” पार्वती ने आगे बढ़ते हुए पूँछा।

कलेक्टर साहब, ” माता जी आप मदद कर सकती हैं, यदि आप हमें अपनी ये एक बीघा जमीन दे दें तो कॉलेज बड़े आराम से बन सकता है और बदले में आपको नया घर व एक बीघा जमीन सरकार देगी, आपको कोई नुकसान नहीं होगा।

पार्वती रीमा की और देखती है और फिर कलेक्टर साहब को देखते हुए, “लेकिन जमीन का मालिकाना हक तो रीमा के पापा के पास है और वो आदमी मर जायेगा पर ये जमीन नहीं देगा।”

कलेक्टर साहब, ” माता जी यदि आप और रीमा तैयार हैं तो उन्हें भी मना सकते हैं, मैं वादा करता हूँ उनको भी कॉलेज उनकी योग्यता के हिसाब से काम जरूर दिला दूंगा। इस प्रकार आपके पास जमीन व मकान के साथ साथ एक सरकारी नौकरी भी होगी।”

रीमा, “सर आप हमें कुछ दिन विचार करने का मौका दें, पिता जी से भी बात करनी होगी।“

ठीक है हम चलते हैं आप एक सप्ताह में विचार कर लें और मुझे शहर आकर मेरे ऑफिस में अपना निर्णय बता देना, मैं उम्मीद करूँगा की आप जैसी स्नातक लड़की शिक्षा के महत्तव को समझेगी और अपने माता पिता को भी समझाने में कामयाब होगी।” कलेक्टर साहब ने को समझाते हुए कहा कहा।

बलदेव थोड़ा सनकी जरूर था पर अपनी बेटी की बात कभी नहीं टालता था, जब रीमा और पार्वती ने उसे समझाया तो वो आराम से मान गया।

रीमा शहर जाकर कलेक्टर साहब से मिलती है और उन्हें अपना निर्णय सुनाती है।

कलेक्टर ऑफिस में

कलेक्टर साहब, “रीमा आपने बड़ा अच्छा  निर्णय लिया है, मैं आपका और आपके माता पिता का धन्यवाद् करता हूँ की आपने मेरे प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।  मुझे उम्मीद थी  आपका निर्णय हां में ही होगा, मैंने उसी वक्त BDO साहब को आदेश कर दिए थे की आपके नए घर के लिए कोई उपयुक्त जमीन चुन कर रखें। उन्होंने आज सुबह ही मुझे आपकी नई जमीन का नक्शा दिया है। वो कॉलेज स्थान से ज्यादा दूर नहीं है और रोड से भी दूर नहीं है।  मैं आज ही उन्हें कॉलेज व आपके लिए नए घर को सरकारी खर्चे पर बनाए जाने के आदेश कर दूंगा।”

“जी धन्यवाद सर” रीमा ने सर हिलाया ।

“धन्यवाद तो हमे करना चाहिए आपने हमारी उलझन सुलझा दी और हाँ आपके लिए एक खुशखबरी है, आपके पिता की उम्र को देखते हुए हम उन्हें कोई नौकरी नहीं दे सकते लेकिन नए कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी के लिए मैंने आपके नाम की अनुसंशा कर दी है। मुझे उम्मीद है जब तक कॉलेज बनकर तैयार होगा तब तक आप अपनी शिक्षा बढ़ा लेंगी।” कलेक्टर साहब ने कहा।

रीमा ख़ुशी ख़ुशी कलेक्टर ऑफिस से लौट आई, अपनी माँ व् पिता को खुशखबरी दी।

इधर सरकार ने बलदेव के लिए दो कमरे और रसोई का नया घर बना दिया, बलदेव के नए घर में सहपरिवार जाने के बाद पुराने घर को तोड़ कर कॉलेज के लिए नया रास्ता बनाय गया।

कुछ वर्षों में कॉलेज भी बनकर तैयार हो गया तब तक रीमा ने भी अपनी योग्यता बढ़ा ली और सरकारी करार अनुसार उसे कॉलेज में सबसे पहली नियुक्ति मिली।

कलेक्टर साहब ने कॉलेज का उद्घाटन पार्वती के हातों करवाया, पार्वती की आँखों में ख़ुशी के आंसू थे और उसके मुँह से फिर निकला कान्हा जो करते हैं अच्छा ही करते हैं ।

इधर रीमा का विवाह कॉलेज के ही एक सहकर्मी से संपन्न हुआ, विवाह के मन्त्र गांव के मंदिर के पंडित जी ने पढ़े उस दिन उन्होंने पार्वती से माफ़ी मांगी और कहा,”पार्वती बहन तुम्हारे कान्हा जो करते हैं सबकी भलाई के लिए करते हैं हम तो बस निम्मित मात्र हैं। भगवन पर विश्वास हो तो बहन पार्वती जैसा हो।”